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Sunday, December 22, 2019

मज़हबी जंग



कभी राजधानी जल रही है,
कभी कोई प्रदेश जल रहा है।
मज़हबी जंग भड़की है हर तरफ
ऐसे अब ये देश चल रहा है।

कभी लड़ते थे 
मंदिर-मस्जिद के नाम पर।
शांत हुआ था मुद्दा
अब चाल वो एक नयी चल रहा है।
धर्मनिपेक्ष से शायद धर्मविशेष 
की ओर अब ये देश ढल रहा है।
मज़हबी जंग भड़की है हर तरफ
ऐसे अब ये देश चल रहा है।

जितनी आँखें उतने नज़ारे
पिस रहे हैं कितने बेचारे।
किससे पूछो कि क्या मुद्दा रहा है
किससे पूछो क्या कुछ बदल रहा है?
सुबह की खबरें वही हैं,शाम का शोक वही
हर तरफ दिख बस उथल-पुथल रहा है।
मज़हबी जंग भड़की है हर तरफ
ऐसे अब ये देश चल रहा है।

चुप हैं यूं तो कई सितारे पर
पूछता है एक नासमझ बेचारा
किसको बोलें कैसे बोलें
क्यों आज फिर देश ऐसे मचल रहा है।
मौन है कोई,कोई तमाशे में खुश हैं
लुट तो हर इक पल रहा है।
मज़हबी जंग भड़की है हर तरफ
ऐसे अब ये देश चल रहा है।

राजनीति के रंग हैं ?
या मुद्दा कोई गहरा है ?
हकीकत को देखने के लिए
आम इंसान आंखें बहुत मल रहा है।
लोगों का तो रहा ही नहीं शायद
देश अब दूषित सोच में पल रहा है।
मज़हबी जंग भड़की है हर तरफ
ऐसे अब ये देश चल रहा है।

जानता हूँ रूखे मन लिए
आएंगे अब महानुभाव कई।
पर क्या करूँ इन शब्दों का
शायद जागरूकता ही एक हल रहा है।
ईर्ष्या और द्वेष से भरे जा रहे हैं मन
लोगों की समझ का हर चेहरा गल रहा है।
मज़हबी जंग भड़की है हर तरफ
ऐसे अब ये देश चल रहा है।

Saturday, November 02, 2019

दीपावली-२०१९




छत के जीने से लटकी लड़ियों को देखा,
कैसे जगमग जल रही हैं।
फिर याद आया सड़कों किनारे फुटपाथ में पलते बच्चों का हस्र,
जिन्दगी कैसे वहां पल-पल लड़ रही है।


याद आया मुझे फिर कि कैसे हमने इस दीवाली घर को था सजाया।
याद आया मुझे कि बेघर उस बच्चे ने पूरे सावन कैसे खुद को था बचाया।


मंदिर के बीचों-बीच देखा,कैसे घर की समृद्धि का प्रतीक लक्ष्मी खड़ी थी।
फिर याद आया फुटपाथ का वो हाल,तन ढकने को वहां कैसे एक "लक्ष्मी" लड़ी थी।


याद आया मुझे फिर कि कैसे हमने घर के हर कोने में एक-एक दिया था जलाया।
याद आया मुझे कि कैसे वो बच्चे ने भूखा होकर एक-एक पल खुद को था सताया।

सोचता हूं,और चाहता हूं आप सब का साथ, कि कैसे ये सब , कुछ कम किया जाए?
जीते हैं हम जितने भी दुःख में चाहे,उसको भूल,ज़रा आपसी सुख में जिया जाए।

Sunday, June 23, 2019

जेठ की वो धूप



चिलमिलाती धूप,अंदर ए.सी. पंखे
बाहर पसरा सन्नाटा खूब याद है।
पूस की रात तो शायद सबने पढ़ी
मुझे तो जेठ की वो धूप याद है।

असहनीय प्यास ने जिन्हें सताया
सुलगती धूप ने जिन्हें भगाया।
फुटपाथ पे तड़पते ज़िन्दगी के कई रूप याद हैं।
पूस की रात तो शायद सबने पढ़ी
मुझे तो जेठ की वो धूप याद है।

एक बंदे के केबिन में ए.सी. पर बिजली बहाए
दिन-भर की मजदूरी में कोई तर-तर पसीने में नहाए।
शहरों में लोगों के बदलते स्वरूप याद हैं।
पूस की रात तो शायद सबने पढ़ी
मुझे तो जेठ की वो धूप याद है।

डी.टी.सी. की बस,दो रुपए के पानी से मिली राहत
बसों में सफर करते मिली कुछ पल की बादशाहत।
मुझे यादों का वो संदूक याद है.....
पूस की रात तो शायद सबने पढ़ी
मुझे तो जेठ की वो धूप याद है।

Wednesday, June 05, 2019

ईद

ईद 



कैसे कहें,
कैसे ये ईद मनाएंगे?
चलो,
थोड़ा तुम रस्में निभाओ
थोड़े हम रिवाज़ निभाएंगे।


तुम हर एक रोज़ा रखना
हम पानी तक पास न लाएंगे।
चलो,
तुम ईदी ले मिलने आना
हम गले लगा मिल जाएंगे।


तुम सेवईं का मीठा चखना
हम उगता चाँद देख आएंगे।
चलो,
तुम इफ़्तार सब के लिए रखना
हम सब को बुला कर लाएंगे।


धर्मों की कट्टरता से नहीं
पर्वों को पवित्रता से सजाएंगे।
चलो,
कुछ तुम भी तो बोलो
फिर कुछ हम बतलाएंगे।


तुम नए कपड़े सी लाना
हम इत्र लगा महकाएंगे।
कुछ ऐसे,
ये ईद मनाएंगे।
चलो,
करो अब तैयारियां
हम भी हाथ बटाएंगे।

Sunday, April 21, 2019

राजनीति २०१९



कुछ नहीं बदला,
अब तक इन सालों में,
जहाँ चली थी राजनीति,
अभी भी है उन्हीं हालों में।

था कुछ यूँही वक्त कटा
फिर मन्दिर तक है बवालों में,
अभी तो था पूजा नारी को,
अभी फिर है सवालों में। 

सरकारें देती कुछ वादे
जनता जीती उन्हें ख्यालों में,
मतदान तक जो देव होते
रह जाते फिर मलालों में।

२०१९ का जाम महकता
फिर वादों के उन प्यालों में,
नेता दिखता फिर एक रोज
फिर खड़ा उन हालों में।

Sunday, April 07, 2019

आजकल



राजनीति का हाल देखा,
विकास के नाम पे होता बवाल देखा,
सुबह-सुबह उठ के न्यूज़ चैनल जो खोला
पूरे दिन का अपने चेहरे पे मलाल देखा।

बस इतना ही देखा,
कि कैसे चंद महीनों में वक्त बदल गया।
५ साल कहो या ६० साल का रोना,
चुनाव देख हर नेता मचल गया।

बस इतना ही देख पाया कि
सो कर मिली शांति न चली जाए।
हो लाख वादों या जुमलों की बातें,
मतदाता की छवि न छली जाए।

कोई चौकीदार कहता है
कोई चौकीदार की बातें कहता है

बस इतना ही सुन पाया कि
कुछ बातें तो पार्टियों से इतर चली जाए।
जनसभाओं और भाषणों से निकल
कुछ बातें देशहित में भी कही जाए।

Monday, March 04, 2019

पढ़ने का शोर




पेपर हैं तो पढ़ाई का है जोर
यहाँ वहाँ बस पढ़ने का है शोर

कितना पढूँ,क्या-क्या पढूँ
बना रखे हैं फार्मूला,मैं क्या गढूं?
बस नंबर खींचने का है जोर
यहाँ वहाँ बस पढ़ने का है शोर

किताबों का लिखा कुछ पल्ले पड़ता नहीं
पूछो तो पता चलता है लिखा होगा कहीं
बस रट्टा मारने का है जोर
यहाँ वहाँ बस पढ़ने का है शोर

रात-दिन है बस पढ़ना पड़ता
अक्ल के हिस्से तो कुछ न पड़ता
बस रात-रात उठने का है जोर
यहाँ वहाँ बस पढ़ने का है शोर







Tuesday, February 26, 2019

नया हिन्दुस्तान



बहा है लहू,अब उनका बहेगा,
कब से चुप बैठा है हिन्दुस्तान
कब तक यूँही सहेगा ?

कभी पठानकोट कभी उरी तो कभी पुलवामा,
कब तक ये सब चलता यूँही रहेगा ?

यूँ तो उनके पाक लोगों से दुश्मनी नहीं हमारी,
पर नापाक नीयत का हर इरादा ढहेगा।

बहुत रह लिए चुप कि अमन हो,
आतंकवाद का अब हर कतरा सहेगा।

गरम होता खून अब खौलने लगा है,
ये नया हिन्दुस्तान अब अपना जवाब कहेगा।


             #भारतीय_वायुसेना
#तेरहवीं_का_तर्पण   #पुलवामा_शहीद

Sunday, January 20, 2019

बचपन ही गया


सुनो,
अब हमेशा के लिए ही आ जाओ ना,
नींद अब तुमसे भी छुपन-छुपाई खेलूं वो बचपन ही गया।

बचपन सी सुबह के मानींद,
अब सवेरे नहीं होते।
ठिकाने तो होते हैं दिन के।
बैचैन रातों के,
अब बसेरे नहीं होते।

शामों में थिरकन,रातों में वो थकान,
बचपन के वो अब किस्से नहीं होते।
थकान तो होती है शामों में अब भी।
उलझती रातों के,
अब सुकूँ वाले हिस्से नहीं होते।

दूर-दूर पतंगों की उड़ाने और उलझते मांझे,
फिर लूटती पतंग वाले वो मलाल नहीं होते।
पछतावे होते हैं आज भी कई बातों के।
यूँही बीती रातों के,
अब बचपन वाले ख्याल नहीं होते।

परेशां नहीं बस सँभालना भूल गया हूँ,
बचपन के स्कूलों से बस्ते अब नहीं संभलते।
उठते हैं आज भी कंधों में बोझ कई।
झुकते कंधे ये,
अब और नहीं ढ़लते।