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Tuesday, June 26, 2018

आदत नहीं

तू रूठने के बहाने ढूंढती है,
मेरी मनाने की अब आदत नहीं।

लगते थे शब शाम सजदे जहाँ,
तुझे मांगने की वहाँ इबादत नहीं।
तू रूठने के बहाने ढूंढती है,
मेरी मनाने की अब आदत नहीं।

कभी जिद्द थी मिलने की तुझसे जहाँ,
तुझसे मिलने की वहाँ अब हिदायत नहीं।
तू रूठने के बहाने ढूंढती है,
मेरी मनाने की अब आदत नहीं।

माँगा था कभी जिससे मुझे,
तेरे उस रब की भी इनायत नहीं।
तू रूठने के बहाने ढूंढती है,
मेरी मनाने की अब आदत नहीं।

चल छोड़,
अपने किये पे पछतावा नहीं,
तो तेरे किए से भी शिकायत नहीं।
पर क्यों अब?
तू रूठने के बहाने ढूंढती है,
जब,
मेरी मनाने की अब आदत नहीं।

Sunday, May 20, 2018

बदल जाता ही है सब

बस कुछ लम्हें,
शायद थोड़ा सा और वक्त,
या थोड़ा सा कुछ और ज्यादा,
फिर बदल जाता ही है सब....

रूठना मनाना भी छूटने लगे जब,
फिर बदल जाता ही है सब....

समझ तक नहीं आता ये होने लगा है कब,
और समझने तक
फिर बदल जाता ही है सब....

शायद आदत सी है मुझे भी अब,
की यूँही हर दफा
फिर बदल जाता ही है सब।

Sunday, April 08, 2018

झटका शायद कुछ जोर का था

बहुत झटके लगे इस दिल को,
पर न जाने कैसे,बस संभलता रहा।
शाम सा था लोगों का भी साथ,
पर न जाने कैसे,मिलने को बस ढलता रहा।

आज,
झटका शायद कुछ जोर का है,

बहुत आश लगाए बैठा था किसी से,
और वक्त भी ये आगे चलता रहा।
अचानक एक "ना" उसकी,
पर न जाने क्यों,आंखें मैं बस मलता रहा।

आज,
झटका शायद कुछ जोर का है,

ना अश्क रुके ना बातें,
पर न जाने कैसे,ख्यालों में ही टहलता रहा।
अभी नहीं, "ना" सही सोच तो रहा था,
पर न जाने क्यों,ये दिल इस बार बस मचलता रहा।

आज,
झटका शायद कुछ जोर का था।