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Sunday, December 16, 2018

कोशिश है मेरी.......


कोशिश है मेरी.......



कोशिश है मेरी,तुमसे,तुमसा इश्क करूँ
मरते हो जैसे तुम मुझपे वैसा ही मैं तुमपे मरूँ।

ये जहाँ भर की कसमें,
ये दुनियाभर की रस्में,
इनसे फिजूल ही मैं क्यों डरूँ?
कोशिश है मेरी,तुमसे,तुमसा ही इश्क़ करूँ।

तुमको पाने की ख़्वाहिशें,
फिर तुमपे लूट जाने की नवाजिशें,
ये दरख्वास्त भी मैं क्यों भरूँ ?
कोशिश है मेरी,तुमसे,तुमसा ही इश्क़ करूँ।

लूट जाऊँ तुमपे,
मर जाऊँ तुमपे,
इस जहाँ से फिर मैं क्या डरूँ ?
कोशिश है मेरी,तुमसे,तुमसा ही इश्क़ करूँ।

तुम्हें चाहूँ तो जी जाऊँ,
तुम्हें जी लूँ फिर मार जाऊँ,
सांसों में हवाएँ मैं बस तब तक भरूँ।
कोशिश है मेरी,तुमसे,तुमसा ही इश्क़ करूँ।

कोशिश है मेरी,तुमसे,तुमसा ही इश्क़ करूँ।
मरते हो जैसे तुम मुझपे वैसा ही मैं तुमपे मरूँ।

Tuesday, November 20, 2018

एक वादा....

ये जो लम्हें होंगें ना,
दरमियाँ अपने.....
इन्हें बड़ी पाक नियत से निभाना है।
ये जो रिश्ता होगा ना,
दरमियाँ अपने......
इसे बड़ी जिम्मेदारी से सजाना है।

आएँगे कई लम्हें मुसीबत के,
उन्हें साथ-साथ ही हराना है।
जो आएँ पल खुशियों के,
उन्हें साथ-साथ ही बढ़ाना है।

ज़िन्दगी की भागदौड़ में,
ढूंढना फुरसत का बहाना है।
जो न दे सके वक्त भी एक-दूसरे को,
तो वक्त से लम्हों को चुराना है।

ये जो रिश्ता होगा ना,
दरमियाँ अपने......
इसे हर कसौटी से जीताना है।
ये जो लम्हें होंगे ना,
दरमियाँ अपने......
इन्हें बड़ी खूबसूरती से बीताना है।

Thursday, November 08, 2018

दीपावली २०१८

दीपावली_२०१८


कुछ हाथ थे जो पटाखों से भरे थे,
और फिर कुछ .......
जो दिये बेचते हुए भी अंधेरों में घिरे थे।

कुछ हाथ थे जो मिठाइयों से भरे थे,
और फिर कुछ .......
एक वक्त की रोटी को मरे थे।

कुछ हाथ थे जो देवों के आगे जुड़े थे,
और फिर कुछ .......
कुछ मिल जाए की उम्मीद में मुड़े थे।

कुछ हाथ थे जो उजाले को उजाला कर रहे थे,
और फिर कुछ .......
अमावस की रात में भी अंधेरे में पल रहे थे।

कुछ हाथ थे जो दीवाली मना रहे थे,
और फिर कुछ .......
अपने में ही अपने सपने बना रहे थे।

Wednesday, October 31, 2018

किस्सा-ए-कहानी

बस बहुत हुआ,
कहानी के किस्सो में अब न यूँ शुमार होंगे।
फिर चाहे,
किसी के दिल के हिस्सों में बार-बार होंगे।

किसी कहानी से निकलकर किस्सा बने 
तो क्या होता है?
सूरज उगे कहीं क्षितिज पर,
भोर न इस किस्से का होता है।

कभी जो किस्सा छूट गया तो,
वक्त कहानी का भी रोता है।
कुछ दिन की वो बात सयानी,
किस्सा कहीं फिर खोता है।

किस्सा बस एक साथ निराला,
कहानी की याद में ही सोता है।
होता कुछ न नया रात भर,

नई सुबह,सब पुराना होता है।

किस्सा ख़ुद जो दूर गया तो,
कहानी का वो छोर नया होता है।
पर साथ न दे पाऊंगी,
कहानी का ये दर्द बयां होता है।

किस्सा कहानी से कब दूर गया,
वो तो हमेशा उसका हिस्सा होता है।
कहानी बढ़े तो आए समझ,
कि आखिर किस्सा तो किस्सा होता है।

Friday, August 10, 2018

वो एक ख्वाब है आता......

बारिश की पहली फुहारों सा,
इश्क के नए खुमारों सा,
सुबह के पहले ख्याल को लाता,
शब के आख़िरी तमस तक जाता,
आँख लगते ही
वो एक ख्वाब है आता

सदियों के मेरे जिक्र सा,
हर मौसम एक फिक्र सा,
जीने का जो एक सलीका लाता,
जिंदगी में फिर रस भर आता,
आँख लगते ही
वो एक ख्वाब है आता


वसंत की हरियाली सा,
मैदानों में फैली खुशहाली सा,
हर दिल में घर कर जाता,
जीने में फिर पर लाता,
आँख लगते ही
वो एक ख्वाब है आता


पल हर पल कुछ अपना सा,
तेरी आँख का इक सपना सा,
हर दम मुझको भा जाता,
तुझ तक मुझको जो लाता,
आँख लगते ही
वो एक ख्वाब है आता


सर्दी की लंबी रातों सा,
कभी न मिटती यादों सा,
यादों का एक संसार सजाता,
तुझसे मेरा प्रेम बताता,
आँख लगते ही
वो एक ख्वाब है आता

Saturday, July 28, 2018

मेरी खामोशी का जवाब हो तुम......

दिनभर जो भागा, रातों को भी जागा,
दिन से होकर रातों को जो जाता,
इस दिल से धड़कन को जगाता,
वो बेहतरिन ख़्वाब हो तुम।
चुप हो जाता हूँ अक्सर मैं यूँही
आखिर मेरी खामोशी का जवाब हो तुम।

तेरी खुशी में शामिल,तुझसे ही कामिल,
तुझसे होकर मुझ तक जो आता
इस दिल के सुरों को जगाता,
वो सुरीला राग हो तुम।
चुप हो जाता हूँ अक्सर मैं यूँही
क्योंकि मेरी खामोशी का जवाब हो तुम।

तेरी बातों का हिस्सा,मेरी यादों का किस्सा,
तुझसे होकर मुझको जो भाता
इस दिल के किस्सों को बताता,
वो नयी किताब हो तुम।
चुप हो जाता हूँ अक्सर मैं यूँही
क्योंकि मेरी खामोशी का जवाब हो तुम।

Friday, July 13, 2018

शहर

कितने बेतरतीब तरीके से बदल देता है,
ये शहर!
कुछ को सफल तो कुछ को मचल देता है,
ये शहर!


फुरसत से बैठे,यूँही फिर कुछ काम किया
गाँव में सभी ने शुरू से यूँही अपना नाम किया
फिर कुछ लोगों की सोच बढ़ी,
फिर कुछ लोगों के ख़्वाब बढ़े,
शायद गाँव की बेरंग सी दुनिया में,
कुछ ख्वाबों का ख्वाब है शहर।


दो वक्त की रोटी भी कभी एक पहर में बना ली
बिन पटाखे,दीपों से ही दीवाली मना ली
फिर कुछ लोगों के काम बढ़े,
फिर कुछ चीजों के दाम बढ़े,
शायद महंगाई भरी इस दुनिया में,
कुछ आहतों में राहत है शहर।


"शायद".....हाँ शहर पे ये एक व्यंग्य है,
शहरों में जैसे जीवन भंग है,
दर-दर भटकता रंक है।
हर बात में नया कोई ढंग है,
पर गाँव में ही अपने जीवन का रंग है।

Friday, July 06, 2018

है प्यार क्या ?

है ख्वाब कोई एहसास कोई
एहसास कोई है पास कोई
उस एहसास को कोई नाम तो दो
पास ही क्यों? साथ भी हो,फरमान तो दो
है प्यार क्या ?
बस एक ख्वाब यूँ बदनाम ना हो।

है ख्वाब कोई गीत कोई
गीत कोई है संगीत कोई
उस गीत में कोई साज तो दो
हो नाज इसपे, ऐसी आवाज तो दो
है प्यार क्या?
बस एक ख्वाब को यूँ ताज ना दो।

ख्वाब को अब ख्वाब ही रहने दो
जो ख्वाहिश हो फिर चाहे,उन्हें कहने दो
ख्वाब पूरा हो कभी,किसे पता
बस इंतेज़ार में अब,जो भी हो सहने दो।

Tuesday, June 26, 2018

आदत नहीं

तू रूठने के बहाने ढूंढती है,
मेरी मनाने की अब आदत नहीं।

लगते थे शब शाम सजदे जहाँ,
तुझे मांगने की वहाँ इबादत नहीं।
तू रूठने के बहाने ढूंढती है,
मेरी मनाने की अब आदत नहीं।

कभी जिद्द थी मिलने की तुझसे जहाँ,
तुझसे मिलने की वहाँ अब हिदायत नहीं।
तू रूठने के बहाने ढूंढती है,
मेरी मनाने की अब आदत नहीं।

माँगा था कभी जिससे मुझे,
तेरे उस रब की भी इनायत नहीं।
तू रूठने के बहाने ढूंढती है,
मेरी मनाने की अब आदत नहीं।

चल छोड़,
अपने किये पे पछतावा नहीं,
तो तेरे किए से भी शिकायत नहीं।
पर क्यों अब?
तू रूठने के बहाने ढूंढती है,
जब,
मेरी मनाने की अब आदत नहीं।

Saturday, June 16, 2018

ईद २०१८

किसी की ईद मन रही है,
किसी की सेवइं बन रही है।
त्योहार तो शायद कुछ वो भी मना रहे हैं,
वरना यूँही बेवजह क्यों लाशें लहू में सन रही हैं।

नापाक वो इरादे,
नापाक वो साजिशें।
नापाक हर वो कोशिश हो रही है।
ईद,दीवाली,रमजान या होली से परे
सरहदों पे जो सैनिकों के दिन और रात हो रही है।

आज ईद,और कल जो लहू बहा है,
इतना ही नहीं इस हिन्द ने पहले भी बहुत कुछ सहा है।
चुप हैं महकमें अब भी, मगर लंबी न ये चुप्पी होगी,
वो नापाक साज़िशों का अधूरा अभी जवाब रहा है।

किसी रोज,
शायद किसी रोज फिर ये हिन्द हुँकार भरेगा,
अब तक का फिर पूरा हिसाब करेगा।
कोशिशें फिर न होंगी आगे,
ऐसे नापाक इरादों वाला हर कोई डरेगा।

फिर शायद दीवाली में डर नहीं दीपों का उजाला होगा,
ईद पे खौफ़ नहीं भाईचारे का बोलबाला होगा।
इंतेज़ार है मुझे हुकूमत के इरादों का इस बार,
कि एक दिन तो हिंदुस्तान भी सुकूं वाला होगा।

Thursday, June 14, 2018

किसी रोज

कभी मोहब्बत का भी इज़हार किया कर
कि कहीं मोहब्बत बस दिल दिल में ना रह जाए।
यूँ तो कहते हो कई किस्से कई दुनिया के
कि कहीं किस्सा-ए-मोहब्बत बस महफ़िल में ना रह जाए।

वरना,
फिर किसी रोज
जन्नत से देखेंगे तुझे।
होता था जिस दिल से इस "दिल' का जिक्र
फिर किसी रोज जन्नत से देखेंगे उसे।

Sunday, May 27, 2018

हार

खुद को हार जाओ,इससे बड़ी क्या हार होगी?
पर मैं तो खुद में ही हार रहा था।
जैसे जिंदा हूँ हर पल
और हर पल ही मुझे मार रहा था।

दास्ताने सुनी हैं हमने भी कई,
पर दास्तानों में भी तो कहीं कोई हम सा नहीं मिल रहा था।
यहाँ हर रोज मुसीबतों से मुसीबतों में उलझा एक पहलू मिल रहा था।

कहानियों को भी एक हिस्से में कुछ राहत तो नसीब होती है।
यहाँ तो बस साँसें चल रही थी, न जाने कहाँ मिले, जहाँ जिन्दगी भी साँसों के करीब होती है।

क्या सिर्फ कहानियों में जीना,सिर्फ इतना भर थी साँस?
कुछ कहानियाँ तो हम भी लिखें,खत्म थी वो भी आस।

साँसें जुदा हो जाए,इतनी ख्वाइश से पहले की कुछ ख्वाइश बाकी है।
लोग जाते हैं मयखाने,और मेरा दर्द ही मेरा साकी है।

Sunday, May 20, 2018

बदल जाता ही है सब

बस कुछ लम्हें,
शायद थोड़ा सा और वक्त,
या थोड़ा सा कुछ और ज्यादा,
फिर बदल जाता ही है सब....

रूठना मनाना भी छूटने लगे जब,
फिर बदल जाता ही है सब....

समझ तक नहीं आता ये होने लगा है कब,
और समझने तक
फिर बदल जाता ही है सब....

शायद आदत सी है मुझे भी अब,
की यूँही हर दफा
फिर बदल जाता ही है सब।

Tuesday, May 08, 2018

नटखट हँसी

चलो आओ आज कुछ तुम्हें सोचकर लिखता हूँ,
तुमने मुझे बहुत देखा इन निगाहों से
अब देखूँ मैं भी,तुम्हारी निगाहों से कैसा दिखता हूँ।

कितनी "नटखट" थी वो हँसी तुम्हारी,
साथ में मेरे,वो जिंदगी हमारी......

खुद को तुम्हारी निगाहों में तलाशा,
तो फिर वो "नटखट" हँसी मिल गयी।
हो कितनी लंबी उदासी,
याद करने से वो "नटखट" हँसी मेरी हंसी फिर खिल गयी।

उस "नटखट" हँसी में भी कितने रंग थे,
साथ हमारे होने के रास्ते भी तो तंग थे।
वो हँसी खुद ही "नटखट" लगने लगी
कई परेशानियों के इतर,जो हम संग थे।

क्या वो "नटखट" हँसी हमारे साथ से थी?
या फिर हमारी बीती याद से थी?
जो भी थी वजह उस "नटखट" हँसी की,
हमारी बातें तो तुम्हारे हँसने की बात से थी।

Sunday, April 22, 2018

अब बस यूँही

अब बस यूँही
तुझे याद करने लगता हूँ,
जैसे,तू इम्तिहान हो मेरा
और हर सवाल में जिक्र हो तेरा....

अब बस यूँही
तुझे याद करने लगता हूँ,
जैसे,तू इत्मीनान हो मेरा
और हर हाल में जिक्र हो तेरा......

अब बस यूँही
तुझे याद करने लगता हूँ,
जैसे,तू भगवान हो मेरा
और हर काल में जिक्र हो तेरा......

अब बस यूँही
तुझे याद करने लगता हूँ,
जैसे,तू सब कुछ हो मेरा
और हर चाल में हर ढाल में,
शांत या बवाल में
बस जिक्र हो तेरा।

अब बस यूँही
तुझे याद करने लगता हूँ।

Saturday, April 14, 2018

नन्हे बीज

कभी नन्हे थे वो बीज,
आज उनपे फसल का जोर है।
कभी मूक थे वो बीज,
आज उनपे जमाने का शोर है।
हवाओं की बयार इस गली,उस गली,
हवाओं का रुख न जाने किस ओर है?

कभी नन्हे थे वो बीज,
आज उनपे फसल का जोर है।

कभी एक एक कर लगाया था उन्हें,
आज उनपे मिट्टी का जोर है।
कभी शान्त भाव से जगाया था जिन्हें
आज उनपे बंधी ना कोई डोर है।
हरियाली की झलक इस गली,उस गली
हरियाली की चमक हर ओर है।

कभी नन्हे थे वो बीज,
आज उनपे फसल का जोर है।

Sunday, April 08, 2018

झटका शायद कुछ जोर का था

बहुत झटके लगे इस दिल को,
पर न जाने कैसे,बस संभलता रहा।
शाम सा था लोगों का भी साथ,
पर न जाने कैसे,मिलने को बस ढलता रहा।

आज,
झटका शायद कुछ जोर का है,

बहुत आश लगाए बैठा था किसी से,
और वक्त भी ये आगे चलता रहा।
अचानक एक "ना" उसकी,
पर न जाने क्यों,आंखें मैं बस मलता रहा।

आज,
झटका शायद कुछ जोर का है,

ना अश्क रुके ना बातें,
पर न जाने कैसे,ख्यालों में ही टहलता रहा।
अभी नहीं, "ना" सही सोच तो रहा था,
पर न जाने क्यों,ये दिल इस बार बस मचलता रहा।

आज,
झटका शायद कुछ जोर का था।

Sunday, April 01, 2018

वाह ! री किस्मत तेरे फैसले

वाह री किस्मत तेरे फैसले,
कल का राही रात बैचैन, 
और दुनियाभर से लड़ जाता है।
सुबह की अजान से पहले उठने का फैसला,
कमजोर एक रात में पड़ जाता है।

वाह री किस्मत तेरे फैसले,
एक सोच में अडिग,सुबह से पहले
कदम डिगा जाता है।
रात्रि भोर बस पहर बीताने,
यादों में नैन भीगा जाता है।

वाह री किस्मत तेरे फैसले,
लाख मंजूर मुझे,
पर तुझसे क्या जीत पाऊँगा?
रातों को जो सोचा,
तुझसे हार कर भी जी जाऊँगा?

वाह री किस्मत तेरे फैसले,
इनसे लड़ जाऊँ,
मुझ में इतनी ताकत नहीं।
कुछ तो रहम कर,
मुझे अपने ही गम से राहत नहीं।

वाह री किस्मत तेरे फैसले,
राहत भी क्या तुझसे,
मुझे मंजूर होगी?
गम से मैं खुद लड़ जाऊँ,
तेरी ये रज़ा भी तो बेकसूर होगी।

वाह री किस्मत तेरे फैसले,
चल इनसे जीतने की 
क्या आजमाइश करूँ।
बस साथ दे तो हर मुश्किल में,
इतनी सी ख्वाइश करूँ।

Sunday, March 25, 2018

साथ तुम्हारा

कोशिशें कामयाबी से जा मिली तो कुछ हाथ तुम्हारा भी था।

खामोशियाँ शोर से जा मिली तो कुछ हाथ तुम्हारा भी था।

दर्द मरहम से जा मिला तो कुछ हाथ तुम्हारा भी था।

"कहानियां" "किस्सो" से जा मिली तो कुछ हाथ तुम्हारा भी था।

परेशानियाँ खुशियों से जा मिली तो कुछ हाथ तुम्हारा भी था।

उलझने सुलझने लगी तो कुछ हाथ तुम्हारा भी था।

मुसिबतें हल पाने लगी तो कुछ हाथ तुम्हारा भी था।

तनहाइयाँ किसी अपने से आ मिली तो वो साथ तुम्हारा ही था।


हाँ काबिल बेशक रहा हूँगा मैं, पर काबिलियत समझा पाया,
वो साथ तुम्हारा ही था।

🖋 भानु_प्रकाश