Tuesday, June 26, 2018

आदत नहीं

तू रूठने के बहाने ढूंढती है,
मेरी मनाने की अब आदत नहीं।

लगते थे शब शाम सजदे जहाँ,
तुझे मांगने की वहाँ इबादत नहीं।
तू रूठने के बहाने ढूंढती है,
मेरी मनाने की अब आदत नहीं।

कभी जिद्द थी मिलने की तुझसे जहाँ,
तुझसे मिलने की वहाँ अब हिदायत नहीं।
तू रूठने के बहाने ढूंढती है,
मेरी मनाने की अब आदत नहीं।

माँगा था कभी जिससे मुझे,
तेरे उस रब की भी इनायत नहीं।
तू रूठने के बहाने ढूंढती है,
मेरी मनाने की अब आदत नहीं।

चल छोड़,
अपने किये पे पछतावा नहीं,
तो तेरे किए से भी शिकायत नहीं।
पर क्यों अब?
तू रूठने के बहाने ढूंढती है,
जब,
मेरी मनाने की अब आदत नहीं।