कुछ बातें ...... छू जाती हैं दिल को बस यूँही। कुछ बातें....... कुछ कह जाती हैं दिल को बस यूँही। रह भी जाती हैं कुछ बातें बस यूँही। सह भी जाती हैं कुछ बातें बस यूँही। यूँही फिर एक ख्याल बनता है। कुछ एहसासों के साथ सनता है। मिलता है कुछ अल्फ़ाज़ों का साथ यूँही.... फिर नज्म,रुबाई,कविता का त्योहार मनता है। झलकियाँ कुछ उसी त्योहार की, शब्दों से जुड़े मेरे कुछ प्यार की।
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कोशिशें कामयाबी से जा मिली तो कुछ हाथ तुम्हारा भी था। खामोशियाँ शोर से जा मिली तो कुछ हाथ तुम्हारा भी था। दर्द मरहम से जा मिला तो कुछ ह...
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ईद कैसे कहें, कैसे ये ईद मनाएंगे? चलो, थोड़ा तुम रस्में निभाओ थोड़े हम रिवाज़ निभाएंगे। तुम हर एक रोज़ा रखना हम पानी तक...
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पेपर हैं तो पढ़ाई का है जोर यहाँ वहाँ बस पढ़ने का है शोर कितना पढूँ,क्या-क्या पढूँ बना रखे हैं फार्मूला,मैं क्या गढूं? बस ...
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बहुत झटके लगे इस दिल को, पर न जाने कैसे,बस संभलता रहा। शाम सा था लोगों का भी साथ, पर न जाने कैसे,मिलने को बस ढलता रहा। आज, झटका शायद ...
Sunday, May 08, 2022
Tuesday, May 11, 2021
सीख जाते हैं
जब
बांध तोड़ आजाद कर देना चाहती हैं
उन
मोतियों को जो तुमने भावनाओं में पिरोए थे।
एक भार दिल से होकर पहुंच जाता है
कहीं
आंखों के उस किनारे तक
जहां
साथ खेलते बच्चों की हंसी
या
दूर डूबते सूरज का सुकून भी
वो
उस भार को हल्का नहीं कर सकता।
ऐसे किसी रोज सीख जाते हो तुम
कि
जरूरी है उस बांध का टूट जाना
कि
जरूरी है ठहरे आंसुओं का छूट जाना
कि
जरूरी है जिंदगी का उत्साह से जिया जाना।
Monday, February 01, 2021
जय जवान जय किसान?
अपनी मांग रख रहे थे
या
हिंसा कर कई मांग उजाड़ रहे थे
किसान तो नहीं हो सकते साहब
क्या कहोगे उनको
जो लाल किले की प्राचीर से तिरंगा उखाड़ रहे थे!
बात ट्रैक्टर मार्च की हुई थी
या
उसकी जो ये हिंसा का प्रचार कर रहे थे
किसान तो नहीं हो सकते साहब
क्या कहोगे उनको
जो देश के दिल की हालत बिगाड़ रहे थे!
बात बेशक कृषि कानूनों की थी
पर ये क्या जो ये पूरा दिन कर रहे थे
किसान तो बस कंधा हैं शायद
क्या दूजी कोई साजिश मुमकिन कर रहे थे!
( शायद मैं ग़लत हूं अपनी राय को लेकर, शायद मैं ग़लत हूं इन हवाओं को लेकर जो कल दिन से हर जगह महसूस हो रही है, शायद मैं ग़लत हूं किसानों पर कही गई मेरी किसी भी राय को लेकर........
लेकिन मैं ग़लत नहीं जो कल लाल किले और देश की राजधानी में हुआ उस पर अपने विचार रख कर। कल जो हुआ उसे ग़लत कहने में कोई 'शायद' नहीं है।
जिस तरह किसानों का मकसद सिर्फ एक शांतिप्रिय मार्च निकालना था उसी तरह मेरा मकसद भी सिर्फ शांतिप्रिय तरीके से अपने विचार रखना है। किसी भी तरह से किसी के विचारों को आहत करना मेरा मकसद नहीं। )
Saturday, November 02, 2019
दीपावली-२०१९
Sunday, June 23, 2019
जेठ की वो धूप
Wednesday, June 05, 2019
ईद
ईद
Monday, March 04, 2019
पढ़ने का शोर
Sunday, January 20, 2019
बचपन ही गया
Friday, July 13, 2018
शहर
ये शहर!
कुछ को सफल तो कुछ को मचल देता है,
ये शहर!
फुरसत से बैठे,यूँही फिर कुछ काम किया
गाँव में सभी ने शुरू से यूँही अपना नाम किया
फिर कुछ लोगों की सोच बढ़ी,
फिर कुछ लोगों के ख़्वाब बढ़े,
शायद गाँव की बेरंग सी दुनिया में,
कुछ ख्वाबों का ख्वाब है शहर।
दो वक्त की रोटी भी कभी एक पहर में बना ली
बिन पटाखे,दीपों से ही दीवाली मना ली
फिर कुछ लोगों के काम बढ़े,
फिर कुछ चीजों के दाम बढ़े,
शायद महंगाई भरी इस दुनिया में,
कुछ आहतों में राहत है शहर।
"शायद".....हाँ शहर पे ये एक व्यंग्य है,
शहरों में जैसे जीवन भंग है,
दर-दर भटकता रंक है।
हर बात में नया कोई ढंग है,
पर गाँव में ही अपने जीवन का रंग है।
Sunday, May 27, 2018
हार
पर मैं तो खुद में ही हार रहा था।
जैसे जिंदा हूँ हर पल
और हर पल ही मुझे मार रहा था।
दास्ताने सुनी हैं हमने भी कई,
पर दास्तानों में भी तो कहीं कोई हम सा नहीं मिल रहा था।
यहाँ हर रोज मुसीबतों से मुसीबतों में उलझा एक पहलू मिल रहा था।
कहानियों को भी एक हिस्से में कुछ राहत तो नसीब होती है।
यहाँ तो बस साँसें चल रही थी, न जाने कहाँ मिले, जहाँ जिन्दगी भी साँसों के करीब होती है।
क्या सिर्फ कहानियों में जीना,सिर्फ इतना भर थी साँस?
कुछ कहानियाँ तो हम भी लिखें,खत्म थी वो भी आस।
साँसें जुदा हो जाए,इतनी ख्वाइश से पहले की कुछ ख्वाइश बाकी है।
लोग जाते हैं मयखाने,और मेरा दर्द ही मेरा साकी है।
Tuesday, May 08, 2018
नटखट हँसी
तुमने मुझे बहुत देखा इन निगाहों से
अब देखूँ मैं भी,तुम्हारी निगाहों से कैसा दिखता हूँ।
कितनी "नटखट" थी वो हँसी तुम्हारी,
साथ में मेरे,वो जिंदगी हमारी......
खुद को तुम्हारी निगाहों में तलाशा,
तो फिर वो "नटखट" हँसी मिल गयी।
हो कितनी लंबी उदासी,
याद करने से वो "नटखट" हँसी मेरी हंसी फिर खिल गयी।
उस "नटखट" हँसी में भी कितने रंग थे,
साथ हमारे होने के रास्ते भी तो तंग थे।
वो हँसी खुद ही "नटखट" लगने लगी
कई परेशानियों के इतर,जो हम संग थे।
क्या वो "नटखट" हँसी हमारे साथ से थी?
या फिर हमारी बीती याद से थी?
जो भी थी वजह उस "नटखट" हँसी की,
हमारी बातें तो तुम्हारे हँसने की बात से थी।
Saturday, April 14, 2018
नन्हे बीज
आज उनपे फसल का जोर है।
कभी मूक थे वो बीज,
आज उनपे जमाने का शोर है।
हवाओं की बयार इस गली,उस गली,
हवाओं का रुख न जाने किस ओर है?
कभी नन्हे थे वो बीज,
आज उनपे फसल का जोर है।
कभी एक एक कर लगाया था उन्हें,
आज उनपे मिट्टी का जोर है।
कभी शान्त भाव से जगाया था जिन्हें
आज उनपे बंधी ना कोई डोर है।
हरियाली की झलक इस गली,उस गली
हरियाली की चमक हर ओर है।
कभी नन्हे थे वो बीज,
आज उनपे फसल का जोर है।






