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Saturday, November 02, 2019

दीपावली-२०१९




छत के जीने से लटकी लड़ियों को देखा,
कैसे जगमग जल रही हैं।
फिर याद आया सड़कों किनारे फुटपाथ में पलते बच्चों का हस्र,
जिन्दगी कैसे वहां पल-पल लड़ रही है।


याद आया मुझे फिर कि कैसे हमने इस दीवाली घर को था सजाया।
याद आया मुझे कि बेघर उस बच्चे ने पूरे सावन कैसे खुद को था बचाया।


मंदिर के बीचों-बीच देखा,कैसे घर की समृद्धि का प्रतीक लक्ष्मी खड़ी थी।
फिर याद आया फुटपाथ का वो हाल,तन ढकने को वहां कैसे एक "लक्ष्मी" लड़ी थी।


याद आया मुझे फिर कि कैसे हमने घर के हर कोने में एक-एक दिया था जलाया।
याद आया मुझे कि कैसे वो बच्चे ने भूखा होकर एक-एक पल खुद को था सताया।

सोचता हूं,और चाहता हूं आप सब का साथ, कि कैसे ये सब , कुछ कम किया जाए?
जीते हैं हम जितने भी दुःख में चाहे,उसको भूल,ज़रा आपसी सुख में जिया जाए।

Wednesday, June 05, 2019

ईद

ईद 



कैसे कहें,
कैसे ये ईद मनाएंगे?
चलो,
थोड़ा तुम रस्में निभाओ
थोड़े हम रिवाज़ निभाएंगे।


तुम हर एक रोज़ा रखना
हम पानी तक पास न लाएंगे।
चलो,
तुम ईदी ले मिलने आना
हम गले लगा मिल जाएंगे।


तुम सेवईं का मीठा चखना
हम उगता चाँद देख आएंगे।
चलो,
तुम इफ़्तार सब के लिए रखना
हम सब को बुला कर लाएंगे।


धर्मों की कट्टरता से नहीं
पर्वों को पवित्रता से सजाएंगे।
चलो,
कुछ तुम भी तो बोलो
फिर कुछ हम बतलाएंगे।


तुम नए कपड़े सी लाना
हम इत्र लगा महकाएंगे।
कुछ ऐसे,
ये ईद मनाएंगे।
चलो,
करो अब तैयारियां
हम भी हाथ बटाएंगे।

Thursday, November 08, 2018

दीपावली २०१८

दीपावली_२०१८


कुछ हाथ थे जो पटाखों से भरे थे,
और फिर कुछ .......
जो दिये बेचते हुए भी अंधेरों में घिरे थे।

कुछ हाथ थे जो मिठाइयों से भरे थे,
और फिर कुछ .......
एक वक्त की रोटी को मरे थे।

कुछ हाथ थे जो देवों के आगे जुड़े थे,
और फिर कुछ .......
कुछ मिल जाए की उम्मीद में मुड़े थे।

कुछ हाथ थे जो उजाले को उजाला कर रहे थे,
और फिर कुछ .......
अमावस की रात में भी अंधेरे में पल रहे थे।

कुछ हाथ थे जो दीवाली मना रहे थे,
और फिर कुछ .......
अपने में ही अपने सपने बना रहे थे।

Saturday, June 16, 2018

ईद २०१८

किसी की ईद मन रही है,
किसी की सेवइं बन रही है।
त्योहार तो शायद कुछ वो भी मना रहे हैं,
वरना यूँही बेवजह क्यों लाशें लहू में सन रही हैं।

नापाक वो इरादे,
नापाक वो साजिशें।
नापाक हर वो कोशिश हो रही है।
ईद,दीवाली,रमजान या होली से परे
सरहदों पे जो सैनिकों के दिन और रात हो रही है।

आज ईद,और कल जो लहू बहा है,
इतना ही नहीं इस हिन्द ने पहले भी बहुत कुछ सहा है।
चुप हैं महकमें अब भी, मगर लंबी न ये चुप्पी होगी,
वो नापाक साज़िशों का अधूरा अभी जवाब रहा है।

किसी रोज,
शायद किसी रोज फिर ये हिन्द हुँकार भरेगा,
अब तक का फिर पूरा हिसाब करेगा।
कोशिशें फिर न होंगी आगे,
ऐसे नापाक इरादों वाला हर कोई डरेगा।

फिर शायद दीवाली में डर नहीं दीपों का उजाला होगा,
ईद पे खौफ़ नहीं भाईचारे का बोलबाला होगा।
इंतेज़ार है मुझे हुकूमत के इरादों का इस बार,
कि एक दिन तो हिंदुस्तान भी सुकूं वाला होगा।