कभी राजधानी जल रही है,
कभी कोई प्रदेश जल रहा है।
मज़हबी जंग भड़की है हर तरफ
ऐसे अब ये देश चल रहा है।
कभी लड़ते थे
मंदिर-मस्जिद के नाम पर।
शांत हुआ था मुद्दा
अब चाल वो एक नयी चल रहा है।
धर्मनिपेक्ष से शायद धर्मविशेष
की ओर अब ये देश ढल रहा है।
मज़हबी जंग भड़की है हर तरफ
ऐसे अब ये देश चल रहा है।
जितनी आँखें उतने नज़ारे
पिस रहे हैं कितने बेचारे।
किससे पूछो कि क्या मुद्दा रहा है
किससे पूछो क्या कुछ बदल रहा है?
सुबह की खबरें वही हैं,शाम का शोक वही
हर तरफ दिख बस उथल-पुथल रहा है।
मज़हबी जंग भड़की है हर तरफ
ऐसे अब ये देश चल रहा है।
चुप हैं यूं तो कई सितारे पर
पूछता है एक नासमझ बेचारा
किसको बोलें कैसे बोलें
क्यों आज फिर देश ऐसे मचल रहा है।
मौन है कोई,कोई तमाशे में खुश हैं
लुट तो हर इक पल रहा है।
मज़हबी जंग भड़की है हर तरफ
ऐसे अब ये देश चल रहा है।
राजनीति के रंग हैं ?
या मुद्दा कोई गहरा है ?
हकीकत को देखने के लिए
आम इंसान आंखें बहुत मल रहा है।
लोगों का तो रहा ही नहीं शायद
देश अब दूषित सोच में पल रहा है।
मज़हबी जंग भड़की है हर तरफ
ऐसे अब ये देश चल रहा है।
जानता हूँ रूखे मन लिए
आएंगे अब महानुभाव कई।
पर क्या करूँ इन शब्दों का
शायद जागरूकता ही एक हल रहा है।
ईर्ष्या और द्वेष से भरे जा रहे हैं मन
लोगों की समझ का हर चेहरा गल रहा है।
मज़हबी जंग भड़की है हर तरफ
ऐसे अब ये देश चल रहा है।







