Sunday, June 23, 2019

जेठ की वो धूप



चिलमिलाती धूप,अंदर ए.सी. पंखे
बाहर पसरा सन्नाटा खूब याद है।
पूस की रात तो शायद सबने पढ़ी
मुझे तो जेठ की वो धूप याद है।

असहनीय प्यास ने जिन्हें सताया
सुलगती धूप ने जिन्हें भगाया।
फुटपाथ पे तड़पते ज़िन्दगी के कई रूप याद हैं।
पूस की रात तो शायद सबने पढ़ी
मुझे तो जेठ की वो धूप याद है।

एक बंदे के केबिन में ए.सी. पर बिजली बहाए
दिन-भर की मजदूरी में कोई तर-तर पसीने में नहाए।
शहरों में लोगों के बदलते स्वरूप याद हैं।
पूस की रात तो शायद सबने पढ़ी
मुझे तो जेठ की वो धूप याद है।

डी.टी.सी. की बस,दो रुपए के पानी से मिली राहत
बसों में सफर करते मिली कुछ पल की बादशाहत।
मुझे यादों का वो संदूक याद है.....
पूस की रात तो शायद सबने पढ़ी
मुझे तो जेठ की वो धूप याद है।

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