Wednesday, October 31, 2018

किस्सा-ए-कहानी

बस बहुत हुआ,
कहानी के किस्सो में अब न यूँ शुमार होंगे।
फिर चाहे,
किसी के दिल के हिस्सों में बार-बार होंगे।

किसी कहानी से निकलकर किस्सा बने 
तो क्या होता है?
सूरज उगे कहीं क्षितिज पर,
भोर न इस किस्से का होता है।

कभी जो किस्सा छूट गया तो,
वक्त कहानी का भी रोता है।
कुछ दिन की वो बात सयानी,
किस्सा कहीं फिर खोता है।

किस्सा बस एक साथ निराला,
कहानी की याद में ही सोता है।
होता कुछ न नया रात भर,

नई सुबह,सब पुराना होता है।

किस्सा ख़ुद जो दूर गया तो,
कहानी का वो छोर नया होता है।
पर साथ न दे पाऊंगी,
कहानी का ये दर्द बयां होता है।

किस्सा कहानी से कब दूर गया,
वो तो हमेशा उसका हिस्सा होता है।
कहानी बढ़े तो आए समझ,
कि आखिर किस्सा तो किस्सा होता है।

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