Sunday, May 27, 2018

हार

खुद को हार जाओ,इससे बड़ी क्या हार होगी?
पर मैं तो खुद में ही हार रहा था।
जैसे जिंदा हूँ हर पल
और हर पल ही मुझे मार रहा था।

दास्ताने सुनी हैं हमने भी कई,
पर दास्तानों में भी तो कहीं कोई हम सा नहीं मिल रहा था।
यहाँ हर रोज मुसीबतों से मुसीबतों में उलझा एक पहलू मिल रहा था।

कहानियों को भी एक हिस्से में कुछ राहत तो नसीब होती है।
यहाँ तो बस साँसें चल रही थी, न जाने कहाँ मिले, जहाँ जिन्दगी भी साँसों के करीब होती है।

क्या सिर्फ कहानियों में जीना,सिर्फ इतना भर थी साँस?
कुछ कहानियाँ तो हम भी लिखें,खत्म थी वो भी आस।

साँसें जुदा हो जाए,इतनी ख्वाइश से पहले की कुछ ख्वाइश बाकी है।
लोग जाते हैं मयखाने,और मेरा दर्द ही मेरा साकी है।