छत के जीने से लटकी लड़ियों को देखा,
कैसे जगमग जल रही हैं।
फिर याद आया सड़कों किनारे फुटपाथ में पलते बच्चों का हस्र,
जिन्दगी कैसे वहां पल-पल लड़ रही है।
याद आया मुझे फिर कि कैसे हमने इस दीवाली घर को था सजाया।
याद आया मुझे कि बेघर उस बच्चे ने पूरे सावन कैसे खुद को था बचाया।
मंदिर के बीचों-बीच देखा,कैसे घर की समृद्धि का प्रतीक लक्ष्मी खड़ी थी।
फिर याद आया फुटपाथ का वो हाल,तन ढकने को वहां कैसे एक "लक्ष्मी" लड़ी थी।
याद आया मुझे फिर कि कैसे हमने घर के हर कोने में एक-एक दिया था जलाया।
याद आया मुझे कि कैसे वो बच्चे ने भूखा होकर एक-एक पल खुद को था सताया।
सोचता हूं,और चाहता हूं आप सब का साथ, कि कैसे ये सब , कुछ कम किया जाए?
जीते हैं हम जितने भी दुःख में चाहे,उसको भूल,ज़रा आपसी सुख में जिया जाए।
