Friday, July 13, 2018

शहर

कितने बेतरतीब तरीके से बदल देता है,
ये शहर!
कुछ को सफल तो कुछ को मचल देता है,
ये शहर!


फुरसत से बैठे,यूँही फिर कुछ काम किया
गाँव में सभी ने शुरू से यूँही अपना नाम किया
फिर कुछ लोगों की सोच बढ़ी,
फिर कुछ लोगों के ख़्वाब बढ़े,
शायद गाँव की बेरंग सी दुनिया में,
कुछ ख्वाबों का ख्वाब है शहर।


दो वक्त की रोटी भी कभी एक पहर में बना ली
बिन पटाखे,दीपों से ही दीवाली मना ली
फिर कुछ लोगों के काम बढ़े,
फिर कुछ चीजों के दाम बढ़े,
शायद महंगाई भरी इस दुनिया में,
कुछ आहतों में राहत है शहर।


"शायद".....हाँ शहर पे ये एक व्यंग्य है,
शहरों में जैसे जीवन भंग है,
दर-दर भटकता रंक है।
हर बात में नया कोई ढंग है,
पर गाँव में ही अपने जीवन का रंग है।