किसी की ईद मन रही है,
किसी की सेवइं बन रही है।
त्योहार तो शायद कुछ वो भी मना रहे हैं,
वरना यूँही बेवजह क्यों लाशें लहू में सन रही हैं।
नापाक वो इरादे,
नापाक वो साजिशें।
नापाक हर वो कोशिश हो रही है।
ईद,दीवाली,रमजान या होली से परे
सरहदों पे जो सैनिकों के दिन और रात हो रही है।
आज ईद,और कल जो लहू बहा है,
इतना ही नहीं इस हिन्द ने पहले भी बहुत कुछ सहा है।
चुप हैं महकमें अब भी, मगर लंबी न ये चुप्पी होगी,
वो नापाक साज़िशों का अधूरा अभी जवाब रहा है।
किसी रोज,
शायद किसी रोज फिर ये हिन्द हुँकार भरेगा,
अब तक का फिर पूरा हिसाब करेगा।
कोशिशें फिर न होंगी आगे,
ऐसे नापाक इरादों वाला हर कोई डरेगा।
फिर शायद दीवाली में डर नहीं दीपों का उजाला होगा,
ईद पे खौफ़ नहीं भाईचारे का बोलबाला होगा।
इंतेज़ार है मुझे हुकूमत के इरादों का इस बार,
कि एक दिन तो हिंदुस्तान भी सुकूं वाला होगा।
किसी की सेवइं बन रही है।
त्योहार तो शायद कुछ वो भी मना रहे हैं,
वरना यूँही बेवजह क्यों लाशें लहू में सन रही हैं।
नापाक वो इरादे,
नापाक वो साजिशें।
नापाक हर वो कोशिश हो रही है।
ईद,दीवाली,रमजान या होली से परे
सरहदों पे जो सैनिकों के दिन और रात हो रही है।
आज ईद,और कल जो लहू बहा है,
इतना ही नहीं इस हिन्द ने पहले भी बहुत कुछ सहा है।
चुप हैं महकमें अब भी, मगर लंबी न ये चुप्पी होगी,
वो नापाक साज़िशों का अधूरा अभी जवाब रहा है।
किसी रोज,
शायद किसी रोज फिर ये हिन्द हुँकार भरेगा,
अब तक का फिर पूरा हिसाब करेगा।
कोशिशें फिर न होंगी आगे,
ऐसे नापाक इरादों वाला हर कोई डरेगा।
फिर शायद दीवाली में डर नहीं दीपों का उजाला होगा,
ईद पे खौफ़ नहीं भाईचारे का बोलबाला होगा।
इंतेज़ार है मुझे हुकूमत के इरादों का इस बार,
कि एक दिन तो हिंदुस्तान भी सुकूं वाला होगा।