बस कुछ लम्हें,
शायद थोड़ा सा और वक्त,
या थोड़ा सा कुछ और ज्यादा,
फिर बदल जाता ही है सब....
रूठना मनाना भी छूटने लगे जब,
फिर बदल जाता ही है सब....
समझ तक नहीं आता ये होने लगा है कब,
और समझने तक
फिर बदल जाता ही है सब....
शायद आदत सी है मुझे भी अब,
की यूँही हर दफा
फिर बदल जाता ही है सब।
शायद थोड़ा सा और वक्त,
या थोड़ा सा कुछ और ज्यादा,
फिर बदल जाता ही है सब....
रूठना मनाना भी छूटने लगे जब,
फिर बदल जाता ही है सब....
समझ तक नहीं आता ये होने लगा है कब,
और समझने तक
फिर बदल जाता ही है सब....
शायद आदत सी है मुझे भी अब,
की यूँही हर दफा
फिर बदल जाता ही है सब।