Sunday, April 08, 2018

झटका शायद कुछ जोर का था

बहुत झटके लगे इस दिल को,
पर न जाने कैसे,बस संभलता रहा।
शाम सा था लोगों का भी साथ,
पर न जाने कैसे,मिलने को बस ढलता रहा।

आज,
झटका शायद कुछ जोर का है,

बहुत आश लगाए बैठा था किसी से,
और वक्त भी ये आगे चलता रहा।
अचानक एक "ना" उसकी,
पर न जाने क्यों,आंखें मैं बस मलता रहा।

आज,
झटका शायद कुछ जोर का है,

ना अश्क रुके ना बातें,
पर न जाने कैसे,ख्यालों में ही टहलता रहा।
अभी नहीं, "ना" सही सोच तो रहा था,
पर न जाने क्यों,ये दिल इस बार बस मचलता रहा।

आज,
झटका शायद कुछ जोर का था।