राजनीति का हाल देखा,
विकास के नाम पे होता बवाल देखा,
सुबह-सुबह उठ के न्यूज़ चैनल जो खोला
पूरे दिन का अपने चेहरे पे मलाल देखा।
बस इतना ही देखा,
कि कैसे चंद महीनों में वक्त बदल गया।
५ साल कहो या ६० साल का रोना,
चुनाव देख हर नेता मचल गया।
बस इतना ही देख पाया कि
सो कर मिली शांति न चली जाए।
हो लाख वादों या जुमलों की बातें,
मतदाता की छवि न छली जाए।
कोई चौकीदार कहता है
कोई चौकीदार की बातें कहता है
बस इतना ही सुन पाया कि
कुछ बातें तो पार्टियों से इतर चली जाए।
जनसभाओं और भाषणों से निकल
कुछ बातें देशहित में भी कही जाए।

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