सुनो,
अब हमेशा के लिए ही आ जाओ ना,
नींद अब तुमसे भी छुपन-छुपाई खेलूं वो बचपन ही गया।
बचपन सी सुबह के मानींद,
अब सवेरे नहीं होते।
ठिकाने तो होते हैं दिन के।
बैचैन रातों के,
अब बसेरे नहीं होते।
शामों में थिरकन,रातों में वो थकान,
बचपन के वो अब किस्से नहीं होते।
थकान तो होती है शामों में अब भी।
उलझती रातों के,
अब सुकूँ वाले हिस्से नहीं होते।
दूर-दूर पतंगों की उड़ाने और उलझते मांझे,
फिर लूटती पतंग वाले वो मलाल नहीं होते।
पछतावे होते हैं आज भी कई बातों के।
यूँही बीती रातों के,
अब बचपन वाले ख्याल नहीं होते।
परेशां नहीं बस सँभालना भूल गया हूँ,
बचपन के स्कूलों से बस्ते अब नहीं संभलते।
उठते हैं आज भी कंधों में बोझ कई।
झुकते कंधे ये,
अब और नहीं ढ़लते।

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