कभी मोहब्बत का भी इज़हार किया कर
कि कहीं मोहब्बत बस दिल दिल में ना रह जाए।
यूँ तो कहते हो कई किस्से कई दुनिया के
कि कहीं किस्सा-ए-मोहब्बत बस महफ़िल में ना रह जाए।
वरना,
फिर किसी रोज
जन्नत से देखेंगे तुझे।
होता था जिस दिल से इस "दिल' का जिक्र
फिर किसी रोज जन्नत से देखेंगे उसे।
कि कहीं मोहब्बत बस दिल दिल में ना रह जाए।
यूँ तो कहते हो कई किस्से कई दुनिया के
कि कहीं किस्सा-ए-मोहब्बत बस महफ़िल में ना रह जाए।
वरना,
फिर किसी रोज
जन्नत से देखेंगे तुझे।
होता था जिस दिल से इस "दिल' का जिक्र
फिर किसी रोज जन्नत से देखेंगे उसे।
No comments:
Post a Comment