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Tuesday, June 26, 2018

आदत नहीं

तू रूठने के बहाने ढूंढती है,
मेरी मनाने की अब आदत नहीं।

लगते थे शब शाम सजदे जहाँ,
तुझे मांगने की वहाँ इबादत नहीं।
तू रूठने के बहाने ढूंढती है,
मेरी मनाने की अब आदत नहीं।

कभी जिद्द थी मिलने की तुझसे जहाँ,
तुझसे मिलने की वहाँ अब हिदायत नहीं।
तू रूठने के बहाने ढूंढती है,
मेरी मनाने की अब आदत नहीं।

माँगा था कभी जिससे मुझे,
तेरे उस रब की भी इनायत नहीं।
तू रूठने के बहाने ढूंढती है,
मेरी मनाने की अब आदत नहीं।

चल छोड़,
अपने किये पे पछतावा नहीं,
तो तेरे किए से भी शिकायत नहीं।
पर क्यों अब?
तू रूठने के बहाने ढूंढती है,
जब,
मेरी मनाने की अब आदत नहीं।

Saturday, June 16, 2018

ईद २०१८

किसी की ईद मन रही है,
किसी की सेवइं बन रही है।
त्योहार तो शायद कुछ वो भी मना रहे हैं,
वरना यूँही बेवजह क्यों लाशें लहू में सन रही हैं।

नापाक वो इरादे,
नापाक वो साजिशें।
नापाक हर वो कोशिश हो रही है।
ईद,दीवाली,रमजान या होली से परे
सरहदों पे जो सैनिकों के दिन और रात हो रही है।

आज ईद,और कल जो लहू बहा है,
इतना ही नहीं इस हिन्द ने पहले भी बहुत कुछ सहा है।
चुप हैं महकमें अब भी, मगर लंबी न ये चुप्पी होगी,
वो नापाक साज़िशों का अधूरा अभी जवाब रहा है।

किसी रोज,
शायद किसी रोज फिर ये हिन्द हुँकार भरेगा,
अब तक का फिर पूरा हिसाब करेगा।
कोशिशें फिर न होंगी आगे,
ऐसे नापाक इरादों वाला हर कोई डरेगा।

फिर शायद दीवाली में डर नहीं दीपों का उजाला होगा,
ईद पे खौफ़ नहीं भाईचारे का बोलबाला होगा।
इंतेज़ार है मुझे हुकूमत के इरादों का इस बार,
कि एक दिन तो हिंदुस्तान भी सुकूं वाला होगा।

Thursday, June 14, 2018

किसी रोज

कभी मोहब्बत का भी इज़हार किया कर
कि कहीं मोहब्बत बस दिल दिल में ना रह जाए।
यूँ तो कहते हो कई किस्से कई दुनिया के
कि कहीं किस्सा-ए-मोहब्बत बस महफ़िल में ना रह जाए।

वरना,
फिर किसी रोज
जन्नत से देखेंगे तुझे।
होता था जिस दिल से इस "दिल' का जिक्र
फिर किसी रोज जन्नत से देखेंगे उसे।