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Tuesday, May 11, 2021

सीख जाते हैं


लबालब सैलाबों से भरी आंखें 

जब

बांध तोड़ आजाद कर देना चाहती हैं

उन

मोतियों को जो तुमने भावनाओं में पिरोए थे।


एक भार दिल से होकर पहुंच जाता है

कहीं

आंखों के उस किनारे तक

जहां

साथ खेलते बच्चों की हंसी

या 

दूर डूबते सूरज का सुकून भी

वो

उस भार को हल्का नहीं कर सकता।


ऐसे किसी रोज सीख जाते हो तुम

कि

जरूरी है उस बांध का टूट जाना

कि

जरूरी है ठहरे आंसुओं का छूट जाना

कि

जरूरी है जिंदगी का उत्साह से जिया जाना।


4 comments:

  1. You are writing better day by day… keep writing like this… take your writing to greater heights… God bless your skills. God bless You.

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  2. Or zaruri hai zindagi ka frse muskurana😊....well done!

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