लबालब सैलाबों से भरी आंखें
जब
बांध तोड़ आजाद कर देना चाहती हैं
उन
मोतियों को जो तुमने भावनाओं में पिरोए थे।
एक भार दिल से होकर पहुंच जाता है
कहीं
आंखों के उस किनारे तक
जहां
साथ खेलते बच्चों की हंसी
या
दूर डूबते सूरज का सुकून भी
वो
उस भार को हल्का नहीं कर सकता।
ऐसे किसी रोज सीख जाते हो तुम
कि
जरूरी है उस बांध का टूट जाना
कि
जरूरी है ठहरे आंसुओं का छूट जाना
कि
जरूरी है जिंदगी का उत्साह से जिया जाना।
