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Sunday, June 23, 2019

जेठ की वो धूप



चिलमिलाती धूप,अंदर ए.सी. पंखे
बाहर पसरा सन्नाटा खूब याद है।
पूस की रात तो शायद सबने पढ़ी
मुझे तो जेठ की वो धूप याद है।

असहनीय प्यास ने जिन्हें सताया
सुलगती धूप ने जिन्हें भगाया।
फुटपाथ पे तड़पते ज़िन्दगी के कई रूप याद हैं।
पूस की रात तो शायद सबने पढ़ी
मुझे तो जेठ की वो धूप याद है।

एक बंदे के केबिन में ए.सी. पर बिजली बहाए
दिन-भर की मजदूरी में कोई तर-तर पसीने में नहाए।
शहरों में लोगों के बदलते स्वरूप याद हैं।
पूस की रात तो शायद सबने पढ़ी
मुझे तो जेठ की वो धूप याद है।

डी.टी.सी. की बस,दो रुपए के पानी से मिली राहत
बसों में सफर करते मिली कुछ पल की बादशाहत।
मुझे यादों का वो संदूक याद है.....
पूस की रात तो शायद सबने पढ़ी
मुझे तो जेठ की वो धूप याद है।

Wednesday, June 05, 2019

ईद

ईद 



कैसे कहें,
कैसे ये ईद मनाएंगे?
चलो,
थोड़ा तुम रस्में निभाओ
थोड़े हम रिवाज़ निभाएंगे।


तुम हर एक रोज़ा रखना
हम पानी तक पास न लाएंगे।
चलो,
तुम ईदी ले मिलने आना
हम गले लगा मिल जाएंगे।


तुम सेवईं का मीठा चखना
हम उगता चाँद देख आएंगे।
चलो,
तुम इफ़्तार सब के लिए रखना
हम सब को बुला कर लाएंगे।


धर्मों की कट्टरता से नहीं
पर्वों को पवित्रता से सजाएंगे।
चलो,
कुछ तुम भी तो बोलो
फिर कुछ हम बतलाएंगे।


तुम नए कपड़े सी लाना
हम इत्र लगा महकाएंगे।
कुछ ऐसे,
ये ईद मनाएंगे।
चलो,
करो अब तैयारियां
हम भी हाथ बटाएंगे।